• मंगलवार, 05 मार्च, 2024

अविचारी उदारता

चुनावों का मतवाला मौसम पुरबहार में खिला है तो डपोरशंख जैसे राजनीतिक पक्ष `मांग, मांग, मांगों तो दूं' ऐसा कहने वाले देवी-देवताओं के रोल में आ गए हैं । मतदाताओं को आकर्षित करने के लिए तरह-तरह के वचन दिए जा रहे   हैं । एक पक्ष ने मध्यप्रदेश को आईपीएल की क्रिकेट टीम दिलाने का वचन दिया है! लेकिन सबसे गंभीरता से विचार करना पड़े ऐसा वचन है गेहूं और चावल के समर्थन भाव में वृद्धि करना। कृषि उत्पादों के समर्थन भाव प्रत्येक बुआई के मौसम के प्रारंभ से पहले केद्र सरकार कृषि खर्च और भाव आयोग की सिफारिशों के आधार पर घोषित करता है जो पूरे देश के लिए समान होता है। इस व्यवस्था को समाप्त करने के लिए राजनीतिक पक्ष और राज्य सरकारें समर्थन भाव पर बोनस घोषित करती   हैं । फिलहाल चुनाव में अनेक पक्ष गेहूं और चावल के समर्थन भाव की तुलना में काफी ऊंचे भाव का वचन दे रही हैं  यह गैर जिम्मेदारी की पराकाष्ठा है। इसका अमल होगा तो महंगाई बढ़ेगी, सरकारी विकास मंद पड़ेगा और खाद्य तेल और दलहन में स्वालंबन का स्वप्न स्वप्न ही रहेगा।

कृषि खर्च और भाव आयोग ने ऐसी घोषणा के सामने दर्शाई है। उनका कहना है कि मने सभी घटकों पर विचार कर खेती में किसान और ग्राहक तीनों का हित बरकरार रहे इस प्रकार भाव दर्शाते   हैं । राजनीतिक पक्ष हमारी मेहनत पर पानी फेर देते   हैं । यदि राजनीतिक नेताओं को ही समर्थन भाव निश्चित करना है तो विशेषज्ञों की जरूरत ही क्या है?

वर्तमान पद्धति के तहत किसान जितना अनाज लाएं वह समर्थन भाव पर खरीदने के लिए सरकार बंधी हुई है। लेकिन एक तरफ सरकार खरीदी व्यवस्था कमजोर है। इसलिए बहुत कम किसानों को इसका लाभ मिलता है। दूसरी तरफ सरकार को अपनी आवश्यकता की तुलना में काफी अधिक अनाज ऊंचे भाव पर खरीदना पड़ता है। अनाज की खरीदी के अलावा इसका संग्रह, रखरखाव और ढुलाई में भारी खर्च लगता है। अधिकांश अनाज मुफ्त अथवा मुफ्त के भाव पर देना होने से खाद्यन्न सब्सिडी का खर्च छप्पर तोड़कर बाहर निकल गया है और अभी बढ़ता ही जाने वाला है।